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*बोट क्लब से निरंकारी मैदान तक…देखिए कैसे बदलती गई आंदोलनों की जगह…*

*बोट क्लब से निरंकारी मैदान तक…देखिए कैसे बदलती गई आंदोलनों की जगह…*

नई दिल्ली। हक की बुलंद होती आवाज लोकतंत्र की आत्मा कही जाती है। विभिन्न मुद्दों को लेकर आए दिन दिल्ली में देशभर से लोग इकट्ठे होते हैं और अपनी आवाज उठाते हैं। कई बार इनका असर भी होता है और सत्ता के कान तक इनकी आवाज भी पहुंचती है। लेकिन साल-दर-साल आंदोलनों की जगहें दिल्ली में सत्ता के केंद्र से दूर होती जा रहीं हैं।

इन दिनों दिल्ली में फिर से हक की आवाज गूंज रही है। मुद्दा है, कृषि कानूनों का विरोध। हजारों की संख्या में देशभर से आए किसान अभी दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं। ज्यादातर किसान अभी भी दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर खड़े हैं। लेकिन कुछ किसान बुराड़ी के निरंकारी मैदान में भी पहुंचे हैं। यह वो जगह है, जो इन किसानों के आंदोलन के लिए सरकार द्वारा चिन्हित की गई है।

लेकिन बहुत सारे किसान इस जगह नहीं आना चाहते, कारण यह है कि निरंकारी मैदान दिल्ली में सत्ता के केंद्र से काफी दूर है। दिल्ली में आंदोलनों की जगह का इतिहास देखें, तो इन किसानों की चिंता समझी जा सकती है। आजादी के बाद से 90 के दशक के अंत तक इंडिया गेट के पास वोट क्लब आंदोलन की महत्वपूर्ण जगह रही है। लेकिन उस जगह प्रदर्शन पर पाबंदी एक ऐसे ही किसान आंदोलन के कारण लगी थी।

32 साल पहले अक्टूबर 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में भारतीय किसान यूनियन के लोगों ने खेती-किसानी से जुड़ी अपनी 35 सूत्री मांगों को लेकर बोट क्लब पर डेरा डाला था। तब 14 राज्यों के करीब 5 लाख किसानों ने एक सप्ताह तक दिल्ली को घेरे रखा। किसानों की मांगों के आगे तत्कालीन राजीव गांधी सरकार को तो झुकना पड़ा, लेकिन इसी आंदोलन के बाद आंदोलनों की इस जगह से हक की आवाज उठनी बंद हो गई।

इसके बाद जंतर-मंतर को बोट क्लब का रूप दिया जाने लगा। यह जगह भी संसद भवन के करीब है और यही कारण है कि अब भी देश के विभिन्न हिस्सों से लोग जंतर-मंतर पर जुटते हैं और अपनी मांगें उठाते हैं। हाल के वर्षों की बात करें, अन्ना आंदोलन की शुरुआत यही से हुई थी। लेकिन बाद में उस आंदोलन ने रामलीला मैदान में बड़ा रूप लिया। आंदोलनों के मद्देनजर रामलीला मैदान भी एक ऐतिहासिक जगह है।

आजादी की लड़ाई से लेकर आपातकाल और जनलोकपाल जैसे महत्वपूर्ण आंदोलनों की जमीन के रूप में आज भी रामलीला मैदान की प्रासंगिकता है। अभी दिल्ली में आंदोलनरत किसान रामलीला मैदान की ही मांग कर रहे हैं, क्योंकि वहां भारी संख्या में लोग इकट्ठे हो सकते हैं। लेकिन सरकार किसानों की इस भीड़ को दिल्ली में प्रवेश नहीं देना चाहती। देखने वाली बात होगी कि ये टकराव कब तक जारी रहती है।

रिपोर्ट – विनम्र सिंह
यूपी हेड-भारत न्यूज 24

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